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क्लाइमेट चेंज और बढ़ती गर्मी: शहरों के लिए नया खतरा

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Blitz Samay
September 22, 2026
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क्लाइमेट चेंज और बढ़ती गर्मी: शहरों के लिए नया खतरा

तापमान बढ़ने के साथ बदल रही है शहरों की जिंदगी

गर्मी अब सिर्फ मौसम का हिस्सा नहीं रह गई है। भारत के कई शहरों में गर्मी का असर अब रोजमर्रा की जिंदगी, स्वास्थ्य, पानी, बिजली और कामकाज तक दिखाई देने लगा है। मौसम विभाग के अनुसार भारत में हीटवेव मुख्यतः मार्च से जून के बीच आती है और उत्तर-पश्चिम, मध्य तथा पूर्वी भारत के बड़े हिस्से इसके प्रभाव में आते हैं।

2026 में भी मौसम विभाग ने कई इलाकों में सामान्य से अधिक गर्मी और हीटवेव वाले दिनों की संभावना जताई थी। जून के लिए IMD ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में सामान्य से अधिक हीटवेव दिनों की संभावना बताई थी।

शहर क्यों ज्यादा तप रहे हैं?

शहरों में बढ़ती गर्मी का संबंध केवल वैश्विक तापमान वृद्धि से नहीं है। तेजी से बढ़ता निर्माण, कंक्रीट की सतह, कम होती हरियाली और यातायात भी स्थानीय तापमान को प्रभावित करते हैं।

इसी को Urban Heat Island Effect कहा जाता है। कंक्रीट और डामर दिन में गर्मी सोखते हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ते हैं। परिणाम यह होता है कि शहरों में रात का तापमान भी पर्याप्त नीचे नहीं आ पाता।

2026 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में शहरी आबादी का अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आना 1983 से 2016 के बीच दोगुने से अधिक हुआ। अध्ययन ने इस वृद्धि में आबादी के विस्तार और बढ़ते तापमान—दोनों की भूमिका बताई है।

रात की गर्मी भी चुनौती

गर्मी का असर केवल दोपहर के तापमान से तय नहीं होता। अगर रात में भी तापमान कम न हो तो शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का पर्याप्त समय नहीं मिलता।

100 भारतीय स्मार्ट शहरों पर 2001 से 2024 के आंकड़ों के विश्लेषण वाले एक हालिया अध्ययन में Nighttime Heatwave और दिन-रात दोनों समय जारी रहने वाली Compound Heatwave को बढ़ते शहरी जोखिम के रूप में चिन्हित किया गया है।

इसका मतलब है कि शहरों के लिए केवल दिन का अधिकतम तापमान देखना पर्याप्त नहीं होगा। रात का तापमान भी स्वास्थ्य और रहने की परिस्थितियों का महत्वपूर्ण संकेतक बन रहा है।

सबसे ज्यादा असर किस पर?

भीषण गर्मी का प्रभाव सभी लोगों पर समान नहीं पड़ता। खुले में काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक, डिलीवरी कर्मचारी, निर्माण श्रमिक, बुजुर्ग, बच्चे और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोग अधिक जोखिम में हो सकते हैं।

IMD ने भी हीटवेव के दौरान बुजुर्गों, बच्चों, बाहरी काम करने वाले लोगों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों को विशेष रूप से संवेदनशील समूह माना है।

यहां गर्मी केवल तापमान का सवाल नहीं रह जाती। यह सामाजिक असमानता का सवाल भी बन जाती है। जिस व्यक्ति के पास ठंडा कमरा, पर्याप्त पानी और काम के समय में लचीलापन है, वह गर्मी से अलग तरह से प्रभावित होगा; खुले में काम करने वाला व्यक्ति अलग तरह से।

पानी और बिजली पर दबाव

गर्मी बढ़ने के साथ पानी की मांग बढ़ती है। दूसरी ओर एयर कंडीशनर और कूलर के इस्तेमाल से बिजली की मांग भी बढ़ती है।

2026 की गर्मी के दौरान देश की अधिकतम बिजली मांग रिकॉर्ड 256.1 गीगावाट तक पहुंची थी। बढ़ती गर्मी और एयर-कंडीशनिंग की मांग बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालने वाले कारकों में शामिल रही।

इस तरह गर्मी का असर केवल मौसम विभाग की चेतावनी तक सीमित नहीं रहता। इसका संबंध शहर की बिजली व्यवस्था, पानी की उपलब्धता और सार्वजनिक सेवाओं से भी जुड़ जाता है।

समाधान केवल AC नहीं

बढ़ती गर्मी से निपटने का रास्ता हर घर में एयर कंडीशनर पहुंचाना नहीं हो सकता। शहरों को अपनी योजना में गर्मी को एक गंभीर जोखिम मानना होगा।

इसके लिए पेड़ और हरित क्षेत्र बढ़ाना, छायादार सार्वजनिक स्थान बनाना, जल स्रोतों को सुरक्षित रखना, छतों और इमारतों को कम गर्म करने वाली डिजाइन अपनाना तथा हीट एक्शन प्लान को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

IMD की हीटवेव गाइडेंस में भी जिला स्तर की चेतावनियों, हीट इंडेक्स, प्रभाव आधारित चेतावनियों और NDMA की गाइडलाइंस जैसी व्यवस्थाओं को शामिल किया गया है।

गर्मी का भविष्य कैसा होगा?

भारत में गर्मी का मौसम नया नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के साथ अत्यधिक गर्मी का जोखिम बढ़ रहा है। IMD के एक अध्ययन में भविष्य के जलवायु परिदृश्यों के तहत मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में हीटवेव की आवृत्ति और अवधि बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।

इसलिए आने वाले वर्षों में शहरों के सामने चुनौती केवल यह नहीं होगी कि तापमान कितना बढ़ेगा, बल्कि यह भी कि शहर उस गर्मी के लिए कितने तैयार हैं।

गर्मी को रोकना किसी एक मौसम या एक विभाग के हाथ में नहीं है। लेकिन उसके प्रभाव को कम करना शहरों की योजना, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक व्यवस्था के जरिए संभव है।

क्योंकि आने वाले समय में किसी शहर की सफलता केवल उसकी ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जाएगी कि वह अपने नागरिकों को बढ़ती गर्मी से कितना सुरक्षित रख पाता है।

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