मोबाइल से लेकर बैंक खाते तक, हर जगह मौजूद है हमारी निजी जानकारी
सुबह मोबाइल पर किसी सामान की जानकारी देखते हैं। कुछ देर बाद उसी सामान का विज्ञापन फेसबुक या इंस्टाग्राम पर दिखाई देने लगता है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मोबाइल हमारी पसंद और जरूरत को पहले ही समझ गया हो।
लेकिन सवाल है कि हमारे बारे में इतनी जानकारी कंपनियों तक पहुंचती कैसे है?
हम मोबाइल नंबर, ई-मेल, पता, फोटो, बैंक की जानकारी और लोकेशन जैसी कई निजी जानकारियां अलग-अलग ऐप और वेबसाइट पर देते हैं। डिजिटल दुनिया में यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। अगर यह गलत हाथों में पहुंच जाए तो इसका नुकसान भी हो सकता है।
डेटा की सुरक्षा के लिए कानून
भारत में लोगों की निजी डिजिटल जानकारी की सुरक्षा के लिए Digital Personal Data Protection Act, 2023 बनाया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में इसके नियम भी जारी किए। इन नियमों का मकसद कंपनियों और संस्थाओं को लोगों के डेटा के इस्तेमाल के लिए जिम्मेदार बनाना है।
कानून के अनुसार किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का इस्तेमाल तय नियमों के तहत किया जाना चाहिए। लोगों को यह जानने का अधिकार भी दिया गया है कि उनकी जानकारी का इस्तेमाल किस काम के लिए किया जा रहा है।
हमारा डेटा आखिर जाता कहां है?
जब हम कोई ऐप डाउनलोड करते हैं तो वह कई तरह की जानकारी मांग सकता है। जैसे मोबाइल नंबर, लोकेशन, कैमरा या कॉन्टैक्ट की अनुमति।
हर अनुमति जरूरी नहीं होती। इसलिए किसी ऐप को अनुमति देने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसे वास्तव में उस जानकारी की जरूरत है या नहीं।
मसलन, एक साधारण गेम को अगर आपकी कॉन्टैक्ट लिस्ट या लोकेशन की जरूरत है, तो सवाल जरूर उठना चाहिए।
डेटा चोरी का खतरा
अगर किसी कंपनी या वेबसाइट का डेटा लीक हो जाता है तो उसमें मौजूद लोगों की जानकारी अपराधियों तक पहुंच सकती है। इसके बाद फर्जी फोन कॉल, मैसेज या ऑनलाइन ठगी की कोशिश हो सकती है।
इसी वजह से बैंक, ई-मेल और सोशल मीडिया खातों में मजबूत पासवर्ड और Two-Factor Authentication का इस्तेमाल करना जरूरी है।
किसी अनजान व्यक्ति को OTP, PIN या पासवर्ड नहीं बताना चाहिए।
बच्चों की जानकारी भी संवेदनशील
बच्चे भी बड़ी संख्या में इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए उनकी निजी जानकारी की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।
डेटा सुरक्षा कानून में बच्चों के डेटा को लेकर विशेष प्रावधान हैं। बच्चों की जानकारी के इस्तेमाल के लिए माता-पिता या अभिभावक की सहमति की व्यवस्था की गई है। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने या उन्हें निशाना बनाकर विज्ञापन देने पर भी कानून में रोक लगाई गई है।
कानून के साथ सावधानी भी जरूरी
सरकार ने डेटा सुरक्षा के लिए कानून बनाया है, लेकिन सिर्फ कानून से समस्या खत्म नहीं होगी। हमें भी सावधान रहना होगा।
किसी ऐप को जरूरत से ज्यादा अनुमति न दें। अनजान लिंक पर क्लिक न करें। सार्वजनिक जगहों के Wi-Fi से बैंकिंग करने से बचें। सोशल मीडिया पर अपनी निजी जानकारी जरूरत से ज्यादा साझा न करें।
सबसे जरूरी बात—किसी भी वेबसाइट या ऐप पर अपनी जानकारी देने से पहले सोचें कि उसे यह जानकारी देने की जरूरत क्यों है।
सुविधा और निजता में संतुलन
आज डिजिटल सेवाओं ने जिंदगी बहुत आसान कर दी है। घर बैठे बैंकिंग, खरीदारी, टिकट और सरकारी सेवाएं मिल रही हैं। लेकिन इसके लिए हम अपनी कुछ निजी जानकारी भी डिजिटल दुनिया में छोड़ रहे हैं।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि तकनीक का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए। सवाल यह है कि तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपनी निजी जानकारी को सुरक्षित कैसे रखा जाए।
डिजिटल दौर में हमारी पहचान सिर्फ आधार कार्ड या पासपोर्ट में नहीं है। हमारे मोबाइल और इंटरनेट पर भी हमारी एक डिजिटल पहचान बन चुकी है।
इसलिए अब हर व्यक्ति के लिए यह समझना जरूरी है कि अपना डेटा बचाना भी उतना ही जरूरी है, जितना अपना पैसा बचाना।