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डीपफेक का खतरा: असली और नकली वीडियो में फर्क कैसे करें?

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Blitz Samay
September 22, 2026
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डीपफेक का खतरा: असली और नकली वीडियो में फर्क कैसे करें?

जब आंखों के सामने दिखने वाली तस्वीर भी सच की गारंटी न रहे

एक वीडियो सामने आता है। चेहरा जाना-पहचाना है, आवाज भी बिल्कुल वही लगती है और व्यक्ति वही बात कहता दिखाई देता है जो कभी उसने कही ही नहीं। वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलता है और कुछ ही समय में हजारों लोग उसे सच मान लेते हैं। यही डीपफेक की सबसे बड़ी चुनौती है—यह झूठ को ऐसी शक्ल दे सकता है, जो देखने में सच जैसी लगे।

डीपफेक AI की मदद से तैयार या बदली गई ऐसी सामग्री है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या हाव-भाव इस तरह बदले जा सकते हैं कि वह व्यक्ति ऐसी बात करता या ऐसा काम करता दिखाई दे, जो वास्तव में उसने नहीं किया। भारत सरकार ने भी सिंथेटिक मीडिया के दुरुपयोग को misinformation, impersonation और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे जोखिमों से जोड़ा है।

सिर्फ मशहूर लोगों का खतरा नहीं

डीपफेक का इस्तेमाल केवल नेताओं, अभिनेताओं या चर्चित हस्तियों के खिलाफ नहीं हो सकता। किसी आम व्यक्ति की आवाज की नकल करके पैसे मांगना, किसी कर्मचारी के नाम से फर्जी निर्देश जारी करना या किसी व्यक्ति को ऐसे बयान देते दिखाना जो उसने कभी नहीं दिया—ये सभी संभावित दुरुपयोग हैं।

MeitY की सामग्री में celebrity investment scam, नकली इंटरव्यू, वरिष्ठ अधिकारी के नाम से फर्जी निर्देश और परिवार के सदस्य की आवाज की नकल कर पैसे मांगने जैसे उदाहरणों को deepfake/synthetic media के संभावित दुरुपयोग के रूप में चिन्हित किया गया है।

पत्रकारिता के सामने नई चुनौती

डीपफेक ने पत्रकारिता के एक पुराने सिद्धांत—“पहले सत्यापन, फिर प्रकाशन”—को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

पहले किसी वीडियो की विश्वसनीयता जांचने के लिए उसके स्रोत, तारीख और स्थान की पुष्टि करना काफी हद तक उपयोगी था। अब पत्रकार को यह भी देखना पड़ता है कि वीडियो या ऑडियो में छेड़छाड़ तो नहीं हुई।

ऐसे मामलों में किसी वायरल वीडियो को सिर्फ इसलिए खबर नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। मूल स्रोत खोजना, संबंधित व्यक्ति या संस्था से प्रतिक्रिया लेना, पुराने वीडियो से तुलना करना और उपलब्ध तकनीकी जांच का इस्तेमाल करना जरूरी है।

भारत सरकार की PIB Fact Check Unit ने अप्रैल 2026 तक 2,913 फैक्ट-चेक प्रकाशित किए थे और इनमें AI-generated तथा misleading videos और deepfakes से जुड़े दावे भी शामिल थे।

पहचान कैसे करें?

आम उपयोगकर्ता के लिए हर डीपफेक को आंखों से पहचान लेना आसान नहीं है। फिर भी कुछ संकेत मदद कर सकते हैं—

  • वीडियो का मूल स्रोत खोजें। केवल फॉरवर्ड किए गए वीडियो पर भरोसा न करें।
  • देखें कि वही खबर विश्वसनीय समाचार माध्यमों या संबंधित संस्था के आधिकारिक चैनल पर मौजूद है या नहीं।
  • आवाज और होंठों की गति में असामान्य अंतर, चेहरे की हरकतों में गड़बड़ी या प्रकाश/छाया में असंगति जैसे संकेतों पर ध्यान दें।
  • वीडियो में किए गए असाधारण दावे को अलग से सत्यापित करें।
  • संदिग्ध वीडियो को तुरंत आगे शेयर करने के बजाय पहले उसकी पुष्टि करें।
  • किसी व्यक्ति की आवाज में पैसे या संवेदनशील जानकारी मांगने वाला संदेश आए तो दूसरे माध्यम से उसकी पहचान की पुष्टि करें।

हालांकि केवल इन दृश्य संकेतों के आधार पर किसी वीडियो को निश्चित रूप से असली या नकली घोषित नहीं किया जा सकता। AI तकनीक लगातार बेहतर हो रही है।

सरकार ने नियम कड़े किए

भारत में 10 फरवरी 2026 को IT Rules में संशोधन किया गया, जो 20 फरवरी 2026 से लागू हुआ। नए प्रावधानों में प्लेटफॉर्मों पर unlawful AI-generated content को रोकने के लिए तकनीकी उपाय, permissible synthetic content की स्पष्ट labelling और traceability जैसी आवश्यकताएं शामिल की गई हैं।

सरकार ने deepfake detection के लिए तकनीकी समाधान विकसित करने की दिशा में भी काम किया है। MeitY की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार C-DAC ने deepfake videos और images की पहचान के लिए एक prototype tool विकसित किया है, जिसे परीक्षण के लिए इस्तेमाल किया गया।

भरोसे का संकट

डीपफेक की सबसे बड़ी समस्या केवल एक नकली वीडियो नहीं है। इससे एक व्यापक trust problem पैदा हो सकती है। यदि लोग असली वीडियो को भी यह कहकर खारिज करने लगें कि “यह AI से बनाया गया होगा”, तो वास्तविक घटनाओं की पुष्टि भी कठिन हो सकती है।

यही कारण है कि आने वाले समय में मीडिया साक्षरता और सत्यापन कौशल आम नागरिक के लिए भी जरूरी होंगे।

पत्रकारों के लिए चुनौती और बड़ी है। उन्हें AI-generated content को पहचानने के साथ-साथ AI को पत्रकारिता के उपयोगी औजार के रूप में भी समझना होगा।

तकनीक से मुकाबला भी तकनीक से

AI ने डीपफेक को संभव बनाया है, लेकिन उसी तकनीकी दुनिया में detection tools, metadata, watermarking और अन्य verification technologies भी विकसित हो रही हैं। भारत सरकार ने deepfake detection, watermarking और responsible AI से जुड़े शोध एवं तकनीकी उपायों को भी बढ़ावा दिया है।

फिर भी कोई एक तकनीकी उपकरण हर स्थिति में अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। सबसे मजबूत सुरक्षा अब भी बहु-स्रोत सत्यापन है।

डीपफेक के दौर में शायद सबसे जरूरी पत्रकारिता कौशल वीडियो बनाना या तेजी से पोस्ट करना नहीं, बल्कि रुकना, सवाल पूछना और प्रमाण तलाशना है।

क्योंकि आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि “हमने क्या देखा?”
सवाल यह भी होगा—“जो हमने देखा, क्या वह वास्तव में हुआ था?”


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